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दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों का आंदोलन सातवें दिन भी रहा जारी, प्रशासन है मौन

दिल्ली विश्वविद्यालय के अतिथि शिक्षकों और शोधार्थियों का आंदोलन मंगवार को भी लगातार सातवें दिन जारी रहा। विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर स्थिति कला संकाय के गेट नंबर-4 पर अतिथि शिक्षकों और शोधार्थियों का  यह धरना शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है और विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी के कारण इनमें आक्रोश दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। बिना टेंट, दरी और पानी के भी आंदोलनकारी अपनी मांग को विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाने के लिए डटे हुए हैं। इनमें अधिकांश वे योग्य अभ्यर्थी हैं जो विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में अध्यापन कर चुके हैं या कर रहे हैं तथा किसी न किसी रूप में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रक्रिया और अनुसंधान से जुड़े हैं।आंदोलनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी संवैधानिक मांगों को न सिर्फ़ अनदेखा कर रहा है बल्कि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन और बैनर लगाने तक की अनुमति नहीं दी जा रही है। आज महाविद्यालयों से कई शिक्षक धरना स्थल पर आये थे उनका भी इस धरने को पूर्ण समर्थन है। महाविद्यालय के शिक्षको का कहना है कि इन अतिथि शिक्षकों और शोधार्थियों की मांग संविधान सम्मत है और जो मुख्य मांग है कि सहायक प्रोफेसर भर्ती में यूजीसी शिक्षक पात्रता नियम 2018 (कॉलेज कैडर) के अनुसार सभी योग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कार का अवसर दिया जाए उसका हम समर्थन करते है।विश्वविद्यालय प्रशासन ने चलती भर्ती प्रक्रिया में नियुक्ति संबंधित नियम में परिवर्तन करके यहां कार्यरत अतिथि शिक्षकों और शोधार्थियों के साथ धोखा किया है। नयी स्क्रीनिंग गाइडलाइंस में सामाजिक न्याय का तो गला ही घोट दिया है। मौलिक अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है।आंदोलनकारी यह भी सवाल उठा रहे हैं कि विश्वविद्यालय ने पांच हजार से अधिक नियुक्तियां करने के बाद अचानक क्यों और किस आधार पर योग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कार से बाहर किया है। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन न तो यह स्पष्ट कर रहा है कि पूर्व में हुई नियुक्तियों में प्रशासन से कौन-सी चूक हुई और न ही यह बता पा रहा है कि चल रही भर्ती प्रक्रिया में नए नियम लागू करने की क्या मजबूरी थी।शोधार्थियों और अतिथि शिक्षकों का कहना है कि सहायक प्रोफेसर नियुक्ति प्रक्रिया एक संवैधानिक और अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है।

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