मैं एक अध्यापक हूँ जो हर रोज सोचता हूँ क्या मैं कक्षा के कालांश में विद्यार्थियों के साथ न्याय कर रहा हूं चाणक्य राष्ट्रनिर्माता अध्यापक रहा है। चाणक्य राजकार्य के लिए राजदीपक जलाता और स्वकार्य हेतु स्वदीपक जलाकर दैनदिनी निपटाते हुए राजशुचिता का अमर सन्देश छोड़ता है। ऐसे अध्यापक ही राष्ट्रनिर्माता बनते हैं। अध्यापक जनता की दशा जानता है। नेता को दिशा देना अध्यापक बखूबी समझता है। कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। जैसे तन-मन-धन की दशा का त्यागी, राष्ट्र निर्माण की दिशा का योगी। इतनी मजबूरियों के दलदल से निकला असम्भव है, वरना अध्यापक राष्ट्र निर्माण में वफादार होता है। अध्यापक अराजकता को सुशासन में लाने वाली पथ-प्रदर्शिका है। अध्यापक लोकतन्त्र को तानाशाही से रोकने वाली मार्गदर्शिका है। अध्यापक विद्यार्थियों को बताता है प्रजा, राजा, राज्य (समाज समुदाय, देश, राष्ट्र)। वैसे ही जैसे ब्रहमा, विष्णु महेश। ब्रहमा का कर्म बनाना, प्रजा का काम उत्पादन करना। विष्णु का कर्म पालना, राजा का काम सुरक्षा करना। महेश का कर्म समग्र उन्मूलनता, राज्य का काम परिवर्तन स्वायत्ता। अध्यापक से प्रधानमंत्री बनने वाला ऐसी शुचिता का दर्शन राष्ट्र को दे सकता है। वेतनभोगी, राज्य सरकारों का नौकरी नहीं, बल्कि स्वनिर्मित, राष्ट्र निर्माण की नाव-पतवार दोनों वहीं हो। वहीं अध्यापक राष्ट्रनिर्माता बता सकता है कि नागरिक के कर्तव्य क्या हैं? सरकार के उत्तरदायित्व क्या-क्या हैं? नागरिक व सरकार की देश के प्रति क्या भूमिका है। देहधारी कोई भी, कहीं का भी, कहीं पर भी, जो राष्ट्राध्यक्ष हो वह देवश्रेणी में खडा करना अनुचित नहीं, घोर अनुचित है। लोकतन्त्र का सच है कि देश और सरकार एक नहीं है। समाज, समुदाय, देश, राष्ट्र, राज्य अमूर्त हैं, मगर सरकार मूर्तवान है। इतिहास का संघर्ष, वर्तमान की आकांक्षाओं का जखीरा, भविष्य की उज्जवल किरणों का सवेरा, समाज समुदाय देश राष्ट्र राज्य स्थायी है मगर आती-जाती गर्म-शीतल हवाओं-सी सरकार सदैव अस्थायी हें। ऐसी सच्चाई ठुकराना, नकारना, धुंधली करना, लोकतन्त्र के लिए क्रान्ति है, विद्रोह है, बगावत है। जब सत्ताधारी राजनीतिक दल स्वहितों को राष्ट्रहितों में बदलकर सरकारी खवैया बन जाता है तब जनता देश, राष्ट्र के बारे में जरूर सोचे। वरना, असहमति पर देशद्रोह-राष्ट्रद्रोह बनाना स्वाभाविक है, सरकार का विरोध देश-राष्ट्र का विरोध आदतन हो जाना है तथा नेता-नेत्री की छवि देश-राष्ट्र की छवि से भुनाना शत प्रतिशत बढ़ते जाना है। लोकतन्त्र की मूल भावना का स्वतन्त्र विचार और बहस के सर्वथा प्रतिकूल है।व्यक्ति पूजा की रीति-परम्परा, प्रथा बन जाने पर संस्थागत ढांचे के नागपोश में जकड़ लेती है। परिणामतः लोकतन्त्र स्वाह हो जाता है। समझो! सरकार हित व राष्ट्र हित हमेशा एक जैसे नहीं होते क्योंकि सरकार का खोल (लिवाफ) दल होते हैं। दल लोकतन्त्र की एक कड़ी हैं। दलों में विविध दृष्टिकोणों का अभाव होता है। राष्ट्र, एकता में अनेकता का दृष्टिकोण धारण किए बैठे हैं, इसलिए सहमति आवश्यक है। बहस जरूरी है। लोकतन्त्र का गर्भ संवाद से अंकुरित होता है जिसमें केन्द्रीय तत्व हैं: नागरिक। नागरिक भागीदारी नितान्त अपरिहार्य है जैसे: अपनी राय रखना, सवाल पूछना, नीतियों का विश्लेषण करके मूल्यांकन करना। गर नागरिक इन जिम्मेदारियों से पीछे हटता है तो वह भीडतन्त्र का नागरिक है। आलोचना, विरोध नहीं होती बल्कि नीतियों का सुधार है। अपरिपक्व लोकन्त्र आलोचना में विरोध देखता है तथा परिपक्व लोकतन्त्र आलोचना में शत्रुता की बजाए मित्रता ढूंढता है। लोकतन्त्र में आलोचना मूल कर्त्तव्य भी है। नागरिक सरकार की नीतियों, निर्णयों और कार्य पद्धति पर सवाल खड़े करें, उनका विश्लेष्ण करें तथा जरूरत पड़ने पर विरोध भी करें, यह नागरिक की सक्रिय नागरिकता का परिचय है। जनता रेवड़ी संस्कृति की नशेड़ी हो चुकी है। उदाहरणतः तमिली संस्कृति, रेवड़ी संस्कृति की खवैया है। तात्कालीन विजय की विजय में जनता जनार्दन ने रेवड़ी संस्कृति पर वोट दिया। यूं वोट खरीदे, फिर जनता-जनार्दन क्या है? जनता जनार्दन खामोश रहे, केन्द्र से चलने वाला एक रुपया ग्रामीण के पास पन्द्रह पैसे ही पहुंचेगा क्योंकि हिस्सेदारी अम्बर से धरा तक है। नागरिक सक्रिय नहीं है तो गाय की भैंस बनाई जाएगी, विकेन्द्रीकरण सत्ता केन्द्रीयकृत होगी। सरकार, राष्ट्र एक दिखाई देने लग जाएंगे। यूं ही तो लोकतन्त्र धरा पर पनपती है तानाशाही। तानाशाह जन्मते हैं क्योंकि उनको राष्ट्र की गरिमा से जोड़कर राष्ट्र का पर्यायवाची बनाकर नागरिक के दिलो-दिमाग में बैठा दिया जाता है। इतना ही नहीं, जनता खुद ही उसे ऊपर वाला मानकर उनके घर बनाना शुरू कर देती है। एक समय था इन्दिरा इज कांग्रेस, कांग्रेस इज इन्दिरा, आपातकाल ठोका मगर मोदी इज नेशन, नेशन इज मोदी, क्रान्ति रोको। राष्ट्र की प्रतिष्ठा राष्ट्राध्यक्ष व्यक्ति निर्धारित नहीं करते बल्कि उस राष्ट्र के संस्थान करते हैं जैसे नागरिकों को स्वतन्त्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता, संस्थानों में नौकरशाही की अलालफीताशाही तथा समाज की समरस संरचना। नागरिक सर्वोेपरि निष्ठा व्यक्ति, दल, सरकार में नहीं बल्कि राष्ट्र को परिभाषित करने वाले मूल्यों में होनी चाहिए। धार्मिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, गौत्रता की जगह समता, बंधुता, स्वतन्त्रता, सम्प्रभुता के प्रति न्यौछावर होनी चाहिए। लोकतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें असहमति को सम्मान मिले। प्रश्नकर्ता में निर्भीकता मिले। सरकारों में जनता के प्रति जवाबदेही मिले। वरना अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति लिंकन की परिभाषा उतनी ही खोखली (लोकतन्त्र, जनता का शासन है, जनता के लिए है, जनता के द्वारा है) है जितनी वर्तमान संस्थानों में नौकरशाहों की लोकतन्त्र के प्रति निष्ठा। संसार के ज्ञानयोग में नागरिक अन्तर्मुखी व बहिर्मुखी होता है। एक ने अंदर, एक ने बाहर ऊपरवाला खोज लिया है। दोनों में कर्मयोग हैं। देह के अंदर ऊपरवाला है, यह ज्ञान है, जो उसने ढूंढा है, वह कर्म है। कर्मयोग के बिना जीवन निरर्थक है। आंख, नाक, कान अपना कर्म करते हैं। इनको बंद करके, दमन करके जीना योग, ज्ञान नहीं मिथ्याचार है। इनको वश में करके जीना सिद्धी है फिर दमन की जरूरत नहीं पड़ती, इन्द्रियों को वश में करना श्रेष्ठ व्यक्ति का कार्य है जैसे: मादा लाख डोले, पुरुषार्थी का पुरुषार्थ न डोले। यही कर्म मार्ग ब्रहमा तक जाता है। यही मोक्ष है। जो व्यक्ति अपनी समस्याओं के बारे में सोचता है, वह तो आपाधापी मानसिकता वाला है, मोह जाल से बाहर निकलो, कर्मफल की इच्छा ही कर्म मार्ग में बाधा है। व्यक्तिगत लाभ-हानि, यश-अपयश के दलदल में कर्मफल ही धकेलता है। कोई भी नेता, राजनेता, राष्ट्राध्यक्ष इस दलदल से बाहर नहीं निकल पाया है। वरना कोई भी राष्ट्राध्यक्ष विभिन्न राष्ट्रों से मिलने वाली सर्वोच्च सम्मानों की श्रृंखला तक नहीं बनाता। संस्थागत कर्मचारी खुद सरकार है। हमारे अपने बन्धु हैं, लालफीताशाही संस्कृति को अन्जाम दें। सरकारी के सर्वेसर्वा प्रतिनिधि हैं, निधिपति न बने, जनता, जनार्दन हैं, वह चोरी न करें जैसे: निम्नवर्ग रेलवे यात्रा कर, मध्यम वर्ग टोल टैक्स कर तथा उपरस्थ वर्ग आय-सेल्स टैक्स कर। जनता गर सौ प्रतिशत है तो कर्मचारी एक-डेढ़ प्रतिशत हैं, सरकार 700-800 व्यक्ति। दोष, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को, क्यों? संख्या बल, राष्ट्राध्यक्षों की देवतुलना करनी छोड़े, राष्ट्र-एकता के लिए पंथ-ग्रन्थ जोड़े। मैं चाणक्य नहीं हूँ। अध्यापक जरूर हूँ मैं अपनी संस्था में नेताजी सुभाष की तर्ज पर कहता हूं कि तुम मुझे समय दो, मैं तुम्हें भविष्य दूंगा, मगर ढाक के तीन पात। फ्रांसीसी राजा लुई चौदहवें ने कहा था ‘मैं ही राज्य हूँ। उसने अपने शासनकाल में राजाओं के दैवीय अधिकार की अवधारणा को दृढ़ता से लागू किया, जिसका अर्थ था उनको अधिकार सीधे ऊपर वाले से प्राप्त होते हैं। याद होगा-फ्रांसीसी क्रांति ही यूरोप में राष्ट्रवाद की जननी थी। अध्यापक हूँ बताता हूं समझता हूं, यही मेरा कर्म है। यही मेरा ज्ञान है क्योंकि मैं विद्यार्थी हूँ शोधार्थी हूँबस सीख रहा हूं। बस एक बात के बाद विश्राम लूंगा। पत्रकार राजीव शुक्ला पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ अमेरिका दौरे पर थे। उन्होंने बताया कि नरसिम्हा राव ने अमेरिकी संसद में एक वाक्या बताया कि एक महिला अपने बच्चे को गाधीजी के पास लेकर आई और बोली, ‘‘मेरे बेटे का गुड़ खाना छुड़वा दो।‘‘ गांधीजी बोले, ‘‘एक महीेने बाद आना।‘‘ महिला एक महीने बाद गांधीजी के पास गई। गांधीजी बोले, ‘‘बेटा गुड़ खाना छोड़ दो।‘‘ लड़के ने गुड़ खाना छोड़ दिया। महिला गांधीजी से बोली, ‘‘यह बात तो पहली मुलाकात में ही कह देते।‘‘ गांधीजी बोले, ‘‘मैंने पहले एक महीेने गुड़ खाना छोड़ा, तब जाकर मैं आपके बेटे का गुड़ छुड़वाने के उपदेश देने योग्य हुआ।‘‘ उस समय सन्दर्भ था अमेरिका पाकिस्तान के पक्षधर स्वरूप कश्मीर के मामले में भारत पर दबाव डाल रहा था और खुद अमेरिका मैक्सिको की जमीन दबा रहा था। परिणामतः नरसिम्हा राव के बताए गए वाक्या पर अमेरिकी सांसदों ने गांधी प्रकरण को समझकर अपने राष्ट्र अमेरिका की बेतुकी पाकिस्तान हितैषी सोच पर घनघोर तालियां बजाईं। अब आप भी तालियां बजाओ, क्योंकि वैश्विक लोकप्रिय यशस्वी नेता आज पांच देशों के दौरे पर निकल पड़े हैं: संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैण्डस, स्वीडन, नार्वे तथा इटली आदि।
कवि एवं लेखक
रोहिताश जमदग्नि