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दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में संपन्न हुआ अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत विदुषी सम्मेलन

 दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में संस्कृत विभाग एवं संस्कृत संस्कृति विकास संस्थान न्यास के संयुक्त तत्वाधान में "अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत विदुषी सम्मेलन 2026" राष्ट्रीय संचेतना एवं युग युगीन नारी विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया गया।
 इस कार्यक्रम में मुख्य तौर पर संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन में महिलाओं (विदुषियों) के योगदान को रेखांकित किया गया। इस सम्मेलन में विश्वभर की महिला संस्कृत विद्वानों, शोधकर्ताओं और शिक्षिकाओं का एक वैश्विक मंच लाने का काम किया गया । इसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका रही महिलाओं की भूमिका को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करते हुए ​"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" सूत्र को चरितार्थ किया। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के विभिन्न युगों में नारी की भूमिका को राष्ट्रीय संचेतना के परिप्रेक्ष्य में समझना, उसका विश्लेषण करना तथा नारी के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं राष्ट्रीय योगदान के प्रति जागरूकता पैदा करना रहा। डॉ. अनिल कुमार मीना ने बताया कि इस सम्मेलन का उद्घाटन मुख्य अतिथि राजस्थान के गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम, सनातनी प्रवक्ता मीनाक्षी सेहरावत, प्राचार्या प्रोफेसर पवित्रा भारद्वाज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रंजन त्रिपाठी, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के कुलानुशासक प्रोफेसर सुधीर कुमार आर्य, प्रोफेसर अंजू कुमार सेठ, प्रोफेसर विजय गर्ग, प्रोफेसर सुषमा चौधरी ने दीप प्रजज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
कार्यक्रम में विदुषियों को पहचान एवं सम्मान दिया गया जिन्होंने संस्कृत साहित्य, व्याकरण, दर्शन और वेदों में अभूतपूर्व योगदान दिया है। दिन में मुख्यतौर पर सांची विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार, प्रो. मीरा द्विवेदी, प्रो. हरप्रीत कौर, डॉ. धर्मा, डॉ. चारू कालरा, आचार्या अन्नपूर्णा इत्यादि विदुषियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने वैश्विक स्तर पर संस्कृत के आधुनिक अनुप्रयोगों (जैसे AI, योग, और आयुर्वेद) पर चर्चा, नई पीढ़ी की छात्राओं को संस्कृत अनुसंधान और करियर के प्रति प्रोत्साहित करना।संस्कृत की धारा को अक्षुण्ण रखने में जितना योगदान ऋषियों का रहा है, उतना ही महत्वपूर्ण योगदान विदुषियों का भी रहा है।वैदिक काल की गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों की परंपरा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है।

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